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मुर्दो का टीला

Unknown Author
4.9/5 (15894 ratings)
Description:पुस्तक के विषय मेंभारत की प्राचीन सम्मत। और संस्कृति का इतिहास मोअन-जो-दड़ो के उत्खनन में मिली सिंधु घाटी की सभ्यता से शुरू होता है । इस सष्यता का विकसित स्वरूप उस समय की ज्ञात किसी सम्मत। की तुलना में अधिक उन्नत है। प्रसिद्ध उपन्यासकार रांगेय राघव ने अपने इस उपन्यास 'मुर्दों का टीला' में उस आदि तन्यता के संसार का सूक्ष्म चित्रण किया है । मोअन-जो-दड़ो सिंधी शब्द है। उसका अर्थ हैं-मृतकों का स्थान अर्थात् 'मुर्दों का टीला'।'मुर्दो का टीला' शीर्षक इस उपन्यास में रांगेय राघव ने एक रचनाकार की दृष्टि से मोअन-जो-दड़ो का उत्खनन करने का प्रयास किया है । इतिहास की पुस्तकों में तो इत सभ्यता के बारे में महज तथ्यात्मक विवरण पाते हैं। लेकिन रांगेय राषद के इस उपन्यास के सहारे हम सिंधु घाटी सभ्यता के समाज की जीवित धड़कनें सुनते हैं।सिंधु पाटी सम्मत। का स्वरूप क्या था? उस समाज के लोगों की जीवन-शैली कैसी थी? रीति-रिवाजवाज कैसे थे? शासन-व्यवस्था का स्वरूप क्या था? इन प्रर्श्नों का इतिहाससभ्मत उतर आप इस उपन्यास में पाएँगे । भारतीय उपमहाद्वदीप की अल्पज्ञात आदि सभ्यता को लेकर लिखा गया यह अद्वितीय उपन्यास है । रांगेय राघव का यह उपन्यास प्राचीन भारतीय सम्भता और संस्कृति में प्रदेश का पहला दरवाजा है ।...मुर्दो का टीलारांगेय राघवजन्म: 17 जनवरी, 1923, आगराभूल नाम : टी.एन वी. आचार्य (तिरुमल्लै नबकम् वीरराघव .आचार्य) ।शिक्षा आगग में। सेंट जॉन्स कांलेज से 1944 में स्नातकोत्तर और 1949 में आगरा विश्वविद्यालय से गुरु गोरखनाथ पर पी-एच. डी. हिंदी, अंग्रेज़ी, ब्रज और सस्कृत पर असाधारण अधिकार।कृतियाँ 13 वर्ष की आयु में लिखना शुरू किया । 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद एक रिपोर्ताज लिखा- दुकानों के बीच यह रिपोर्ताज हिन्दी में चर्चा का विषय बना ।मात्र 39 वर्ष की आयु में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, सस्कृति और सभ्यता पर कुल मिलाकर 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं । साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, सगीत और पुरातत्व में विशेष रुचि । अनेक रचनाओं का हिंदीतर भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद ।सम्मान हिदुस्तानी अकादमी पुस्कार (1947), डालमिया पुरस्कार (1954) उत्तरप्रदेश शासन पुरस्कार (1957 तथा 1959), राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) और मरणोपरात महात्मा गाधी पुरस्कार (1966) से सम्मानित।निधन. लंबी बीमारी के बाद 12 सितंबर, 1962 को बंबई में ।We have made it easy for you to find a PDF Ebooks without any digging. And by having access to our ebooks online or by storing it on your computer, you have convenient answers with मुर्दो का टीला. To get started finding मुर्दो का टीला, you are right to find our website which has a comprehensive collection of manuals listed.
Our library is the biggest of these that have literally hundreds of thousands of different products represented.
Pages
341
Format
PDF, EPUB & Kindle Edition
Publisher
Radhakrishna Prakashan
Release
2007
ISBN

मुर्दो का टीला

Unknown Author
4.4/5 (1290744 ratings)
Description: पुस्तक के विषय मेंभारत की प्राचीन सम्मत। और संस्कृति का इतिहास मोअन-जो-दड़ो के उत्खनन में मिली सिंधु घाटी की सभ्यता से शुरू होता है । इस सष्यता का विकसित स्वरूप उस समय की ज्ञात किसी सम्मत। की तुलना में अधिक उन्नत है। प्रसिद्ध उपन्यासकार रांगेय राघव ने अपने इस उपन्यास 'मुर्दों का टीला' में उस आदि तन्यता के संसार का सूक्ष्म चित्रण किया है । मोअन-जो-दड़ो सिंधी शब्द है। उसका अर्थ हैं-मृतकों का स्थान अर्थात् 'मुर्दों का टीला'।'मुर्दो का टीला' शीर्षक इस उपन्यास में रांगेय राघव ने एक रचनाकार की दृष्टि से मोअन-जो-दड़ो का उत्खनन करने का प्रयास किया है । इतिहास की पुस्तकों में तो इत सभ्यता के बारे में महज तथ्यात्मक विवरण पाते हैं। लेकिन रांगेय राषद के इस उपन्यास के सहारे हम सिंधु घाटी सभ्यता के समाज की जीवित धड़कनें सुनते हैं।सिंधु पाटी सम्मत। का स्वरूप क्या था? उस समाज के लोगों की जीवन-शैली कैसी थी? रीति-रिवाजवाज कैसे थे? शासन-व्यवस्था का स्वरूप क्या था? इन प्रर्श्नों का इतिहाससभ्मत उतर आप इस उपन्यास में पाएँगे । भारतीय उपमहाद्वदीप की अल्पज्ञात आदि सभ्यता को लेकर लिखा गया यह अद्वितीय उपन्यास है । रांगेय राघव का यह उपन्यास प्राचीन भारतीय सम्भता और संस्कृति में प्रदेश का पहला दरवाजा है ।...मुर्दो का टीलारांगेय राघवजन्म: 17 जनवरी, 1923, आगराभूल नाम : टी.एन वी. आचार्य (तिरुमल्लै नबकम् वीरराघव .आचार्य) ।शिक्षा आगग में। सेंट जॉन्स कांलेज से 1944 में स्नातकोत्तर और 1949 में आगरा विश्वविद्यालय से गुरु गोरखनाथ पर पी-एच. डी. हिंदी, अंग्रेज़ी, ब्रज और सस्कृत पर असाधारण अधिकार।कृतियाँ 13 वर्ष की आयु में लिखना शुरू किया । 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद एक रिपोर्ताज लिखा- दुकानों के बीच यह रिपोर्ताज हिन्दी में चर्चा का विषय बना ।मात्र 39 वर्ष की आयु में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, सस्कृति और सभ्यता पर कुल मिलाकर 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं । साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, सगीत और पुरातत्व में विशेष रुचि । अनेक रचनाओं का हिंदीतर भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद ।सम्मान हिदुस्तानी अकादमी पुस्कार (1947), डालमिया पुरस्कार (1954) उत्तरप्रदेश शासन पुरस्कार (1957 तथा 1959), राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) और मरणोपरात महात्मा गाधी पुरस्कार (1966) से सम्मानित।निधन. लंबी बीमारी के बाद 12 सितंबर, 1962 को बंबई में ।We have made it easy for you to find a PDF Ebooks without any digging. And by having access to our ebooks online or by storing it on your computer, you have convenient answers with मुर्दो का टीला. To get started finding मुर्दो का टीला, you are right to find our website which has a comprehensive collection of manuals listed.
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Pages
341
Format
PDF, EPUB & Kindle Edition
Publisher
Radhakrishna Prakashan
Release
2007
ISBN
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